सिंधु जल संधि विवाद
भारत ने हेग (The Hague) स्थित स्थायी मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर दिए गए हालिया फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि इस मध्यस्थता अदालत को मामले की सुनवाई करने का कोई वैध अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) हासिल नहीं है। भारत ने इस पूरी प्रक्रिया को संधि की मूल शर्तों का खुला उल्लंघन करार दिया है।
किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाओं से जुड़ा है विवाद
यह पूरा विवाद जम्मू-कश्मीर में झेलम की सहायक नदी पर बन रही किशनगंगा परियोजना (330 मेगावाट) और चेनाब नदी पर निर्माणाधीन रातले पनबिजली परियोजना (850 मेगावाट) के तकनीकी डिजाइन को लेकर है।
पाकिस्तान इन परियोजनाओं के डिजाइन पर आपत्ति जताते हुए वर्ष 2016 में सीधे हेग स्थित मध्यस्थता अदालत पहुंच गया था। दूसरी ओर, भारत का तर्क रहा है कि संधि की विवाद समाधान प्रणाली तीन चरणों में बंटी हुई है:
पहला चरण: दोनों देशों के सिंधु आयुक्तों (Indus Commissioners) के बीच बातचीत।
दूसरा चरण: तकनीकी मुद्दों के समाधान के लिए विश्व बैंक द्वारा ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) की नियुक्ति।
तीसरा चरण: केवल बड़े कानूनी विवादों पर ही मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) का गठन।
भारत का सख्त रुख: दोहरी प्रक्रिया स्वीकार नहीं
भारत शुरू से ही इस विवाद के तकनीकी समाधान के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति का समर्थन करता रहा है। जब विश्व बैंक ने तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थता अदालत दोनों प्रक्रियाओं को एक साथ आगे बढ़ाने का फैसला किया, तो भारत ने इसे संधि के प्रावधानों के विपरीत बताते हुए मध्यस्थता अदालत की कार्यवाही का पूरी तरह बहिष्कार किया था।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत ने इस गैर-संवैधानिक रूप से गठित अदालत में कभी भाग नहीं लिया और न ही इसके किसी फैसले को स्वीकार करने के लिए बाध्य है। भारत ने दोहराया कि पाकिस्तान द्वारा संधि के विवाद निपटान तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है।
सिंधु जल संधि में संशोधन की मांग
गौरतलब है कि 1960 में हुई सिंधु जल संधि के छह दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद, भारत पहले ही इसमें औपचारिक संशोधन (Modification) के लिए पाकिस्तान को नोटिस जारी कर चुका है। भारत का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, जनसांख्यिकी में बदलाव और सीमा पार आतंकवाद के मौजूदा दौर में इस संधि की समीक्षा बेहद जरूरी है।











