Rahul Gandhi Defamation Case Bombay High Court: ‘चोरों का सरदार’ टिप्पणी मामले में राहुल गांधी को झटका, बॉम्बे हाई कोर्ट ने समन रद करने से किया इनकार
प्रमुख बिंदु (Key Highlights):
याचिका खारिज: बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई विवादित टिप्पणी को लेकर दर्ज आपराधिक मानहानि मामले में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की समन रद करने वाली याचिका खारिज कर दी है।
मजिस्ट्रेट के आदेश में खामी नहीं: न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि 2019 में गिरगांव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन आदेश में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए 6 हफ्ते की मोहलत: अदालत ने राहुल गांधी को राहत देते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट की सुनवाई पर 6 सप्ताह तक की रोक जारी रखी है, ताकि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें।
राफेल सौदे पर दिया था बयान: यह पूरा मामला 2018 में राफेल डील को लेकर राजस्थान में दिए गए एक भाषण और सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है।
मुंबई:
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अदालती मोर्चे पर बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणी से जुड़े आपराधिक मानहानि के मामले में संज्ञान लेते हुए Rahul Gandhi Defamation Case Bombay High Court (राहुल गांधी मानहानि केस बॉम्बे हाई कोर्ट) में मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी समन को रद करने से साफ मना कर दिया है।
हाई कोर्ट की एकल पीठ ने राहुल गांधी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मुंबई की गिरगांव मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा जारी समन और आपराधिक कार्रवाई को चुनौती दी थी।
देश की न्यायिक प्रणाली, उच्च न्यायालय के आदेशों और आपराधिक प्रक्रिया संहिता के आधिकारिक नियमों की विस्तृत जानकारी के लिए आप Bombay High Court Official Portal पर विवरण देख सकते हैं।
मजिस्ट्रेट के आदेश में कोई गैरकानूनी बात नहीं: हाई कोर्ट
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर ने निचली अदालत के समन को पूरी तरह वैध करार दिया:
दखल देने से इनकार: अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट द्वारा प्रक्रिया शुरू करने और समन जारी करने के आदेश में कोई कानूनी कमी या त्रुटि नहीं पाई गई है। इसलिए सीआरपीसी (CrPC) की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर इसमें हस्तक्षेप करने का कोई औचित्य नहीं बनता।
राहत की मियाद बढ़ाई: हालांकि, अदालत ने राहुल गांधी को एक तात्कालिक राहत भी दी है। कोर्ट ने साल 2021 के अपने उस अंतरिम आदेश को छह सप्ताह के लिए और बढ़ा दिया है, जिसके तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्यवाही स्थगित रहेगी। इससे राहुल गांधी को इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का समय मिल जाएगा।
क्या था पूरा मामला और किसने दर्ज कराई थी शिकायत?
यह मानहानि शिकायत साल 2019 में भाजपा कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमल द्वारा मुंबई की गिरगांव अदालत में दायर की गई थी:
सितंबर 2018 का भाषण: शिकायतकर्ता के अनुसार, सितंबर 2018 में राजस्थान के जयपुर में एक राजनीतिक रैली को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ ‘कमांडर-इन-थीफ’ (चोरों का सरदार) जैसी अपमानजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया था। (Rahul Gandhi Defamation Case Bombay High Court )
पार्टी कार्यकर्ताओं की मानहानि का दावा: शिकायत में आरोप लगाया गया कि प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह के झूठे और आधारहीन आरोप लगाकर राहुल गांधी ने न केवल प्रधानमंत्री, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है।
अगस्त 2019 में जारी हुआ था समन: इन आरोपों और प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर गिरगांव कोर्ट ने 28 अगस्त 2019 को राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की धारा 500 के तहत संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था।
राहुल गांधी के वकीलों की दलीलें हुईं खारिज
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान राहुल गांधी के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि:
शिकायतकर्ता इस मामले में ‘पीड़ित पक्ष’ (Aggrieved Party) नहीं है, क्योंकि बयान सीधे तौर पर उनके खिलाफ नहीं दिया गया था।
यह शिकायत पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद है, इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि भाषण के जरिए प्रत्यक्ष रूप से गंभीर आरोप लगाए गए थे और मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखने के बाद ही कानून सम्मत आदेश पारित किया था। हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता के तर्कों को स्वीकार करते हुए राहुल गांधी की याचिका खारिज कर दी।
निष्कर्ष (Rahul Gandhi Defamation Case Bombay High Court)
बॉम्बे हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद राहुल गांधी के लिए कानूनी अड़चनें बढ़ गई हैं। यदि तय 6 हफ्तों के भीतर सुप्रीम कोर्ट से उन्हें कोई विशेष राहत या स्टे नहीं मिलता है, तो उन्हें मुंबई की मजिस्ट्रेट अदालत के समक्ष पेश होना पड़ सकता है या फिर ट्रायल का सामना करना पड़ेगा। राजनीतिक बयानों में शब्दों के चयन को लेकर यह मामला एक बार फिर न्यायिक बहस के केंद्र में आ गया है।











